मानव धर्म का विज्ञान
(An Exploration of Science in Manava Dharm)
Part - I
Chapter 1
(लेखक का परिचय)
श्री अवध बिहारी लाल गुप्ता—‘तनमय’ का जन्म 24 दिसम्बर 1932 को हुआ।
सन् 1958 में सिविल इंजीनियरिंग के स्नातक स्तर की शिक्षा पूरी की तथा 1990 में केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग से एक उच्च पद से सेवा निवृत्त हुए।
1980 में होम्योपैथी पर एक शोधपुस्तक लिखी, जिसका सारांश जनवरी 1982 में एक अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका HMAI के V/10 अंक में प्रकाशित हुआ।
वैदिक साहित्य, विज्ञान एवं होम्योपैथी पर परिश्रमपूर्वक किए गए स्वाध्याय के फलस्वरूप सर्वप्रथम 1997 में गायत्री मंत्र की वैज्ञानिक व्याख्या लिखी, जो पहली बार सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) के यशस्वी मासिक ‘दि इंडियन डाउन अन्डर’ (The Indian Down Under) के जून 1997 के Vol. 10/9 में प्रकाशित हुई। इस शोध-पत्र को सिडनी एवं भारत में अनेक सभाओं में पढ़ा गया तथा दूरदर्शन से भी प्रसारित किया गया। तत्पश्चात वैदिक साहित्य पर अनेक शोध-पूरक लेख लिखे, जिनका भारत की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन किया गया।
प्रस्तुत पुस्तक उन शोध-पत्रों और व्याख्यानों का संकलन है, जिन्हें लेखक महोदय ने अपनी संस्था के सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत किया।
Chapter 2
(धन्यवाद ज्ञापन एवं स्नेह संप्रेषण)
| डॉ. सुभाष चन्द्र सचदेवा (हर्ष) | M.A., Ph.D. | वरिष्ठ प्राध्यापक | सोनीपत |
| डॉ. कृष्ण वल्लभ पालीवाल | M.Sc., Ph.D. (Chemistry) | पूर्व प्रोफेसर, पूरा संस्थान | नई दिल्ली |
| डॉ. जयवीर सरस्वत | M.Sc. (Geology), Ph.D. (Environ) | संपादक, कृषि विज्ञान पत्रिका, पूरा संस्थान | दिल्ली |
| डॉ. सुनील खेत्रपाल | M.B.B.S., M.D. (Med.) | हृदय एवं मानसिक रोग विशेषज्ञ | दिल्ली |
| इं. विजय कुमार सहोता | B.E. (Elect.) | पूर्व मुख्य अभियंता (वि.) | नई दिल्ली |
| डॉ. प्रीतिवत (रेकी ग्रैंडमास्टर) | B.E. (E) | पूर्व मण्ड़ल निर्देशक (वि.) | नई दिल्ली |
| श्री अनिरुद्ध कौशिक | M.B.A. | विविध भाषा प्रशिक्षक, ज्योतिषविद् | दिल्ली |
Chapter 3
(दो शब्द प्रो. बी० आर० चावला [अध्यक्ष])
पुस्तक के भाग-2 की रचना हमारी संस्था के निदेशक (Director) महोदय द्वारा नये विभिन्न सिद्धान्तों पर सभा के सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत की गयी चर्चा पर आधारित है तथा इस में प्रकृति के सिद्धान्तों पर आधारित ‘मानव-धर्म’ की व्याख्या आधुनिक विज्ञान के शब्दों में की गयी है।
गीता के अध्याय ग्यारह की भाँति ही विराट दर्शन की वैज्ञानिक समझ इस पुस्तक का विशेष आकर्षण है और दूसरी सबसे बड़ी शोध की बात है ‘प्रतिध्वनिविज्ञान’ का अद्भुत वैज्ञानिक विवेचन, जो ‘वैदिक-धर्म’ का हृदय है। तथा तीसरी महत्वपूर्ण बात है ‘निराकार और साकार’ उपासना की तकनीक के सम्बन्ध में। इस प्रकार यह रचना विश्व प्रसिद्ध पुस्तक Tao of Physics (By Dr. Fritjof Capra, Ph.D.) के स्तर की है।
इस पुस्तक में लेखक महोदय ने विशाल वैदिक धर्म के अनेक मत-मतांतरों का समन्वय एवं एकत्व स्थापित करने का सुन्दर प्रयास किया है। पुस्तक के तीसरे खण्ड में मानव-धर्म का आधार – “गायत्री मंत्र” की वैज्ञानिक व्याख्या दी गयी है, जिससे पण्डितों एवं भारतीय चिन्तकों द्वारा की गयी उच्च कोटि के शोध कार्य की जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त वैदिक-धर्म के शोध सम्बन्धी अनेक लेख तीसरे खण्ड में जोड़े गये हैं।
धर्म का स्वरूप बतलाते हुए लेखक महोदय ने प्रकृति के शाश्वत सिद्धान्तों की बहुत सुन्दर विज्ञान-सम्मत व्याख्या की है। यह अपने आप में एक अद्भुत प्रयास है। इसी प्रकार संस्कृति का स्वरूप प्रकृति का व्यवहार बतलाया गया है। यही कारण है कि ‘प्राकृतिक-धर्म’ ही ‘मानव-धर्म’ है अर्थात ‘वैदिक-सनातन-धर्म’ है, ये तीनों ही समानार्थक हैं; ऐसा सिद्ध किया गया है।
Chapter 4
(भूमिका श्रीमती परमजीत कौर [ महासचिवा ])
मानव-धर्म प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से ‘मानव-धर्म का विज्ञान’ विषय पर पुस्तक के प्रकाशन से हमें अति हर्ष हो रहा है। हमारी संस्था ‘मानव-धर्म’ प्रशिक्षण कार्यक्रम को पिछले तीन वर्षों से भी अधिक समय से स्कूली बच्चों को धर्म की वैज्ञानिक शिक्षा देने हेतु ‘बाल शिविर’ के माध्यम से चलाती आ रही है।
संस्था के निदेशक ‘डॉ॰ तनमय’ ने इस दिशा में पहल की और हमारी संस्था की विधिवत् स्थापना 6 अक्टूबर 2002 को एक भव्य कार्यक्रम द्वारा हुई। इस कार्यक्रम का उद्घाटन माननीय दिनेश चन्द्र जी त्यागी, अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम में अनेक गणमान्य एवं विद्वान अतिथियों ने पधार कर अपना आशीर्वाद प्रदान किया।
Chapter 5
(प्रस्तावना डॉ० विजय कौशिक, निदेशक, भा०रू० है ०ए० मॉस्को)
यह आधुनिक युग वस्तु-विज्ञान (Material Sciences) का युग है, जहाँ विश्लेषण, प्रमाण और तार्किक सोच को प्रमुखता दी जाती है। डॉ. तनमय ने महसूस किया कि धर्म के क्षेत्र में भी इन तीनों की आवश्यकता है। ‘The Vedic Dharm and Modern Science’ का यह अंग्रेज़ी संस्करण इसी सोच का परिणाम है। लेखक ने सनातन (शाश्वत) वैदिक धर्म और आधुनिक विज्ञान के बीच अद्भुत और सटीक समन्वय स्थापित किया है।
मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि इस ग्रंथ का वैज्ञानिक जगत स्वागत करे, और इससे प्राप्त ज्ञान मानवता का मार्गदर्शन करे, जिससे विश्व में व्याप्त अशांति और हिंसा कम हो सके। पूरी मानवता शांति से रहे।
(सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः; सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्)।
Chapter 6
(अपनी बात – तन्मय)
मेरी प्रेममयी माता ने बचपन में ही मुझे धार्मिक शिक्षाएँ दी थीं। इसके बाद, शायद पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण, मेरे भीतर विज्ञान के प्रति रुचि विकसित हुई। इसलिए मैंने कई ऐसी पुस्तकें पढ़ीं, जिनमें धार्मिक तथा वैज्ञानिक दोनों प्रकार का ज्ञान सम्मिलित था।
सन् 1963 से 1966 के दौरान, मुझे रामकृष्ण मिशन लाइब्रेरी, दिल्ली में स्वामी विवेकानंद के व्याख्यानों का हिंदी संस्करण—जो दस खंडों में उपलब्ध था—पढ़ने का अवसर मिला। इससे मुझे यह आभास हुआ कि धर्म का विज्ञान से गहरा संबंध है।
सन् 1980 में, मुझे स्वामी चिन्मयानंद द्वारा लिखित उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्याएँ पढ़ने को मिलीं। इससे मुझे यह विश्वास हो गया कि वैदिक धर्म में विज्ञान निहित है।
